Chandragupta Maurya Episode 106 to 124 Story

Chandragupta Maurya Episode 106 to 124 Story

Chandragupta Maurya Episode 106 to 124 Story

Chandragupta Maurya serial Imagine Tv पर साल 2011 में start हुआ था। इस show के total 124 episodes बनने थे पर चैनल के shutdown हो जाने से इस show के महज 105 episodes ही बन पाए। हम ने इस show के सभी episodes के links इस पेज़ पर दिए है।

आप में से कई visitors द्वारा request की गई कि किसी तरह इस show को पूरा करवाया जाए या इसकी आगे की story बताई जाए। हम show को पूरा तो नही बनवा सकते पर इसकी आगे की story जरूर बता सकते हैं।

हमारे पास officialy इस show की full story available नहीं है पर हम history और show की story के base पर आगे की story बताएंगे।

Chandragupta Maurya की आगे की story हमने एक video में बताई है। वो video नीचे embedded किया गया है। अगर आपको नीचे video देखने में कोई problem आ रही है, तो आप सीधे इस link पर video देख सकते हैं।

Chandragupta Maurya Episode 106 to 124 Story Watch on YouTube

Chandragupta Maurya Episode 01 to 105 Story in Brief

पहले हम आपको चंद्रगुप्त मौर्य धारावाहिक के पहले 105 episodes की कहानी short में बताएंगे ताकि आगे की कहानी से अच्छा तालमेल बैठ जाए।

धारावाहिक की शुरूआत में हमें पता चलता है कि सिकंदर नाम का एक युनानी हमलावर लगातार कई देशों को जीतता हुआ भारत की तरफ़ बढ़ रहा है। तक्षशिला के मुख्य आचार्य, आचार्य चाणक्य से इस बात पर विचार विमर्श करते हुए भारत की संस्कृति और स्वतंत्रता के प्रति चिंता करते है।

आचार्य चाणक्य अपना मत पेश करते है कि अगर पूरे भारत खंड को एक कर दिया जाए तो कोई भी हमलावर भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नही करेगा। उनके मत अनुसार इस समय मगध सबसे शक्तिशाली राज्य है और वो भारत के सभी जनपदों को एक करके सिकंदर जैसे हमलावर का मुकाबला कर सकता है।

आचार्य चाणक्य मगध के राजा धनानंद के पास अपना यह विचार लेकर जाते है। पर धनानंद एक विलासी, अत्याचारी और क्रूर राजा होता है जिसने मगध की जनता को बेवजह के करों से परेशान कर रखा होता है। धनानंद आचार्य चाणक्य का भरी सभा में अपमान कर देता है और उन्हें महल से बाहर निकलवा देता है।

आचार्य चाणक्य अपने इस अपमान के कारण प्रतिज्ञा लेते है कि जब तक को धनानंद को खत्म करके मगध की गद्दी पर किसी योग्य राजा को नहीं बिठा देते तब तक वो अपनी शिखा नहीं बाधेंगे।

इसी दौरान आचार्य चाणक्य की मुलाकात चंद्रगुप्त नामक बालक से होती है जिसकी बहादुरी और चपलता को देखकर उन्हें उसमें एक योग्य राजा के गुण नज़र आते है। चाणक्य चतुराई से चंद्रगुप्त को शिकारी की गुलामी से आज़ाद करवा देते हैं।

इसके बाद आचार्य चाणक्य चंद्रगुप्त को तक्षशिला लिजाकर हर तरह की शिक्षा देते है, चंद्रगुप्त के कई विरोधी उसे परेशान भी करते है पर वो हार नहीं मानता।

फिर वो समय आता है जब सिकंदर भारत पर हमला करता है, चाणक्य और चंद्रगुप्त मिलकर हर वो परियास करते है जिससे सिकंदर को वापिस भेजा जा सके, और वो इसमें सफ़ल भी हो जाते है।

इसके बाद चाणक्य और चंद्रगुप्त धनानंद के खिल़ाफ अपना संघर्ष शुरू करते है। वो अहीरियां नाम की जाति, चाणक्य के शिष्य दिग्विजय और कुछ अन्य लोगों को मिलाकर एक सेना बना लेते है जो बसंत उत्सव के मौके पर धनानंद पर हमला करते है। पर दिग्विजय के विश्वासघात के कारण चंद्रगुप्त की सेना की हार हो जाती है और आचार्य चाणक्य बूरी तरह से टूट जाते हैं।

ऐसी विकट प्रस्थिति में चंद्रगुप्त आचार्य चाणक्य को हौसला देता है और फिर दोनों मिलकर धनानंद के विरूद्ध संघर्ष आरंभ कर देते है। वो राजा पुरु के बेटे के पास सहायता के लिए जाते है पर वो चंद्रगुप्त को कोई सहायता करने के लिए राजी नहीं होता क्योंकि इसमें उसका कोई लाभ नहीं।

आचार्य चाणक्य यह फैसला करते है कि वो अब आदर्शों के बल पर नहीं बल्कि साम,दाम,दंड,भेद और कुटिलता की नीति से चलकर अखंड भारत का निर्माण करेंगे।

सबसे पहले वो तक्षशिला के राजे अंभी और सिकंदर के सेनापित युदोमोस के बीच मतभेद करवा कर दोनों को मरवा देते है और इस तरह से चंद्रगुप्त तक्षशिला और गंधार का राजा बन जाता है।

आचार्य चाण्कय चंद्रगुप्त को सलाह देते है कि वो किसी तरह से अमात्य राक्षस से मगध की राजमुद्रिका प्राप्त कर ले जो आगे चलकर उनके बहुत काम आएगी। चंद्रगुप्त एक योजना के तहत मगध की राजमुद्रिका प्राप्त भी कर लेते है।

यह तो थी पहले 105 episodes की कहानी, अब आपको आगे की कहानी बतातें है-

Chandragupta Maurya Episode 106 to 124 Story

चंद्रगुप्त तक्षशिला और गंधार का राजा बनने के बाद आसपास के छोटे राज्यों को अपने राज्य में मिलाना शूरू कर देता है और सिकंदर के बचे कुचे सैनिकों को भारत से भगा देता है। अपना राज्य विस्तार करने के लिए वो साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाता है। साम का अर्थ है विरोधी से बातचीत करके, अगर बातचीत से काम ना बने दो दाम की नीति से, अर्थात् धन देकर। अगर साम और दाम से काम ना बनें तो दंड अर्थात् सेना का प्रयोग करके। भेद की नीति का प्रयोग करके वो अपने विरोधियों को कभी भी एक नही होने देता।

चंद्रगुप्त जब उत्तर-पश्चिमी भारत के सभी राज्यों को जीत लेता है तो फिर वो मगध को जीतने की तैयारी करते है। उस समय भी चंद्रगुप्त की सेना की शक्ति धनानंद के कम ही होती है। धनानंद के पास लगभग 2 लाख पैदल सेना, 20 हज़ार घोड़सवार, 3 हज़ार रथ और 2 हज़ार हाथी होते है।

चाणक्य फैसला करते है कि वो धनानंद की सेना को बांट कर उसे अलग – अलग युद्धों में हराएंगे और अगर जरूरत पड़ी तो छापामार हमला भी करेंगे। वो अपने कई गुप्तचरों को पहले ही धनानंद की सेना में भरती करवा देते है।

अमात्य राक्षस से चुराई हुई राजमुद्रिका का प्रयोग करके वो धनानंद के सेनापति भद्रशाल के पास धनानंद के नाम से यह संदेश भिजवा देते है कि वो अपनी सेना को लेकर ब्यास नदी पर पहरा लगवा लें क्योंकि उन्हें सूचना मिली है कि चंद्रगुप्त उनके राज्य पर हमला करने वाला है। इस तरह से धनानंद के पास आधी से भी कम सेना रह जाती है क्योंकि वो अपनी ज्यादातर सेना को भद्रशाल के साथ भेज देता है।

उधर चंद्रगु्प्त भद्रसाल का ध्यान बटानें के लिए अपने कुछ हज़ार सैनिकों को शशांक के साथ ब्यास नदी के किनारे भेज देता ताकि भद्रसाल को लगे कि वो उन पर हमला करने वाले है। चंद्रगुप्त किसी और रास्ते से अपनी बड़ी सेना लेकर पाटलीपुत्र की ओर निकल पड़ता है।

इधर जब व्यास नदी के किनारे शशांक के नेतृत्व में चंद्रगुप्त की छोटी सी सेना भद्रसाल का ध्यान बटाएं हुए होती है तो उधर चंद्रगुप्त पाटलीपुत्र पर हमला कर देता है। धनानंद की सेना में मौजूद चाणक्य के गुप्तचर धनानंद की सेना को धनानंद के विरूद्ध भड़काने का काम करते है। धनानंद की समर्थक सेना कमज़ोर पड़ जाती है और वो युद्ध हार जाती है।

उधर जब इस बात का पता भद्रसाल को चलता है तो फौरन पाटलीपुत्र की ओर दौड़ता है पर धनानद की पुत्री और चंद्रगुप्त की प्रेमिका दुरधरा उसे और आचार्य सुखदेव को मरवा देती है।

मगध की सेना के ज्यादातर सेनापतियों को चाणक्य चालाकी से मरवा देते है और अपने गुप्तचरों से कहते है कि वो लगातार मगध की सेना को धनानंद के अत्याचारों के विरुद्ध भड़काते रहें। इसके बाद मगध के ज्यादातर सैनिक चंद्रगुप्त के साथ हो जाते है और उसे अपना राजा मान लेते है।

मगध पूरी तरह से चंद्रगुप्त के राज में आ जाता है।

चंद्रगुप्त आचार्य चाणक्य के सामनें धनानंद का कत्ल कर देता है और चाणक्य अपनी शिखा बांधते है। इसके बाद चंद्रगुप्त धुरधरा से शादी कर लेता है।

मगध को अपने राज्य में मिलाने के बाद चंद्रगुप्त वंग प्रदेश (बांग्लादेश) और दक्षिण के राज्यों को जीतना शुरू कर देता है। इसके बाद आता है 305 ईसापूर्व का वो समय जब सिकंदर का सेनापित सैल्युकस सिकंदर की भारत विजय को पूरी करने के लिए भारत पर हमला करता है।

जिस समय सिकंदर भारत पर हमला करता है उस समय भारत कई छोटे राज्यों में बंट चुका होता है, पर सैल्युक्स के हमले के समय स्थिती बिलकुल विपरीत होती है। पूरे उत्तर भारत पर एक शक्तिशाली राजा राज कर रहा होता है – चंद्रगुप्त।

सिंधु नदी के किनारे सैल्युक्स यवन और चंद्रगुप्त की भारतीय सेना के बीच भयंकर युद्ध होता है जिसमें यवनो के छक्के छुड़ा दिए जाते है। सैल्युक्स को संधि करने पर मज़बूर होने पड़ता है।

चंद्रगुप्त अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान के कई हिस्से यवनों से वापिस मांग लेता है और सैल्युक्स की एक पुत्री हेलेना का विवाह भी अपने साथ करवाता है। बदले में चंद्रगुप्त 500 हाथी सैल्युक्स को भेट करता है।

लगभग 70 फीसदी अखंड भारत को जीतने बाद 298 ईसापूर्व में महज 42 साल की उम्र में चंद्रगुप्त सब कुछ त्यागकर मगध की गद्दी अपने पुत्र बिंदुसार को सौंप देते है और जैन मुनि बन जाते है।

चंद्रगुप्त कनार्टक राज्य में श्रवणबेलगोल स्थान पर अन – जल त्याग कर इस संसार से चले जाते है और अपने पीछे छोड़ जाते है एक अमर इतिहास।

महाराज चंद्रगुप्त का राज्य उत्तर-पश्चिम भारत में अफ़गानिस्तान से लेकर पूर्व में आसाम तक और दक्षिण में गोदावरी तक फैला हुआ था। इसके बाद उनके पुत्र बिंदुसार और पोते अशोक ने भी राज्य की सीमा में विस्तार किया और निर्माण क्या भारत के सबसे बड़े साम्राज्य का।

…………..समाप्त…………..

दोस्तों, अगर आपको हमारे द्वारा Chandragupta Maurya serial की आगे की story पसंद आई हो तो इसे अपने जानने वालों से जरूर share कीजिएगा। धन्यवाद।

Tags : Chandragupta Maurya Episode 106

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